इंतज़ार-ए-इंतकाम part 1

दोस्तोंये बात कोई ८ साल पहले की है। मेरी मौसी जो की पहले हेलेट हॉस्पिटल के पास रहती थीवहां से कानपुर के दुसरे छोर पर स्थित विकास नगर नामक एरिया में स्थानातरित हो गयीं थी। वहां उन्होंने एक घर लिया था अच्छा खासा आलीशान घर था वह। उस घर के सामने एक स्कूल भी हैशायद नारायण करके कुछ नाम है। काफी वक़्त हुआ वहां गए हुए इसलिए ठीक से उस स्कूल का नाम याद नहीं है। 



इंतज़ार-ए-इंतकाम part 1
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इंतज़ार-ए-इंतकाम part 1


लेखक :- गुमनाम कानपुरिया  

दोस्तों, ये बात कोई ८ साल पहले की है। मेरी मौसी जो की पहले हेलेट हॉस्पिटल के पास रहती थी, वहां से कानपुर के दुसरे छोर पर स्थित विकास नगर नामक एरिया में स्थानातरित हो गयीं थी। वहां उन्होंने एक घर लिया था अच्छा खासा आलीशान घर था वह। उस घर के सामने एक स्कूल भी है, शायद नारायण करके कुछ नाम है। काफी वक़्त हुआ वहां गए हुए इसलिए ठीक से उस स्कूल का नाम याद नहीं है। 


खैर मैं घर के बारे में बताता हूँ, वो घर देखने में बहुत खुबसूरत था। काफी बड़ा घर था मगर वो घर अक्सर अकेले लोगों को भाता नहीं था। मतलब कोई भी वहां दिन में भी अकेले ठेहेरना पसंद नहीं करता था। उसकी वजह थी घर का काफी बड़ा होना और वहां अक्सर दोपहर और रात को घर में ऐसी शांति सी छा जाती थी मानो किसी कब्रस्तान में आ गए हों। उस घर में कई कमरों में तो कभी सूरज की रौशनी भी नहीं पहुँचती थी। इसलिए वो घर बहार से देखने में जितना सुन्दर था अन्दर से उतना ही डरावना लगता था। लेकिन मौसी और उनके परिवार को इसकी कोई चिंता नहीं थी क्योकि वो ज्यादा लोग थे और घर में कोई भी ऐसा नहीं था की जिसे भूतो पर विश्वास हो। जब से मौसी और उनका परिवार वहां रहने गया तो उस मकान में रौनक आई और वो मकान से घर बना। करीब सब कुछ सामान्य और खुशहाल था करीब ६ महीने तक। उसके बाद वहां अजीब सी घटनाएं घटी। घर के सबसे आगे वाले दो कमरे में से एक मौसी के ससुर जी का कमरा था और दूसरा मेहमानों के लिए था। 


जिस कमरे में दादा जी (मौसी के ससुर जी) रहते थे, उस कमरे में दरवाज़े के पास उन्होंने अपना पलंग लगा रखा था। सर्दियों का वक़्त था, दादा जी ने हवा आने की वजह से पलंग को दूसरी तरफ लगवाया और जो की कमरे के बीचो बीच की जगह थी। पलंग लगवाने के बाद उस रात जब दादा जी सोये तो उन्होंने एक सपना देखा की एक बड़ा सा करीब दस फुट का आदमी एक फरसा लेकर उनकी पलंग के पास आया और उस वक़्त दादा जी खुद को हिल भी नहीं पा रहे और न ही मुह से आवाज़ निकल रही थी। फिर उसने फरसा उठाया और जोरदार वार किया उनकी गर्दन पर। उसके वार से दादा जी की आंखें खुल गयीं और वो पसीने से भीगे हुए थे ठण्ड के मौसम में भी। फिर दादा जी उठे और वक़्त देखा तो दो बजने में ५ मिनट बाकि थे। सपना समझ कर बात को नज़रंदाज़ किया और उन्होंने पास रखे गिलास से पानी पिया और वापस सोने की कोशिश करने लगे। 


थोड़ी देर बाद उन्हें फिर से नींद आ गयी इस बार उन्होंने फिर वही सपना देखा फिर से वही आदमी फरसा लेके खड़ा था और दादा जी की निगाह पड़ते ही उसने फरसे से दादा जी की गर्दन पर वार कर दिया। दादा जी की आंख फिर से खुल गयी और इस बार सपने ने दादा जी का दिमाग ख़राब कर दिया था। वो समझ चुके थे के ये कोई आम सपना नहीं है, कोई तो है यहाँ जो नहीं चाहता यहाँ पर किसी की मौजूदगी। इस विचार और उधेड़बुन में उन्होंने सपने दिखने वाली उस शक्ति को समझने की कोशिश की, वो सही थी या गलत थी? गलत होती तो बीते ६ महीने पहले ही मुझे नुक्सान पहुंचा चुकी होती, और अगर सही है तो ये रूप और ये वार क्यों कर रही है? उनकी कुछ समझ नहीं आ रहा था। क्या करें इतनी रात को क्या न करें? और सुबह उठ कर भी क्या कर लेंगे? फिर सोचा की पहले परिवार में इस बात पर विचार विमर्श किया जाये उसके बाद देखा जाये की क्या होता है? उन्होंने रात जागते जागते काट दी, सुबह नाश्ते के वक़्त उन्होंने सबको एक जगह बुलाया और बीती रात की पूरी कहानी बता डाली। दादा जी कह रहे थे इसलिए कोई इस बात को टाल भी नहीं सकता था, और फिर कोई भी सपना दो बार आये तो वो शायद ही इत्तेफाक हो। दादा जी ने सबसे पूछा की क्या किया जाये? मौसा जी ने कहा के "किसी भी तांत्रिक को बुलाना या उस पर विश्वास करना ठीक नहीं है। 


मुझे तांत्रिको पर विश्वास नहीं है।" दादा जी ने उनकी तरफ देखा फिर बिना कुछ बोले मौसी जी के सबसे बड़े बेटे यानि मेरे भईया से इशारे में पूछा। भईया को कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने सीधे तौर पर कह दिया के "दादा जी आज आप मेहमानों के कमरे में सो जाओ, मैं वहां सो जाता हूँ। देखते हैं वहां सच में कोई बात है या सिर्फ आपको कोई डरना चाहता है।" दादा जी ने पहले तो उन्हें मना किया मगर फिर भईया के मनाने पर दादा जी को बात सही लगी और उन्होंने वैसा करना ही उचित समझा और उस रात वो बगल के कमरे में जो की मेहमानों के लिए था वहां सोना मंजूर कर लिया। उस रात दादा जी खाना खाने के बाद मेहमानों वाले कमरे में सोने चले गए। वो वहां लेटे हुए थे और दरवाज़ा खोल रखा था। उन्हें बड़े भईया की चिंता लगी हुयी थी कहीं अकेले में डर न जाएँ। बड़े भईया को आने में थोड़ी देर हो गयी थी इसलिए वो बाद में सोने आने वाले थे और दादा जी खुले दरवाज़े से उनके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। वो इस तरह से लेटे हुए थे की उन्हें दुसरे कमरे का दरवाज़ा दिख रहा था। तभी उन्होंने देखा की बड़े भईया तेज़ी से आये और दरवाज़ा खोलकर अन्दर जाने लगे। 


दादा जी ने दो तीन बार नाम लेकर उन्हें आवाज़ लगायी मगर उन्होंने अनसुना कर दिया और कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया। दादा जी ने सोचा की ये कैसा बर्ताव कर रहा है? शायद अन्दर से भाई या बहन से लड़कर आया होगा। इस तरह उन्होंने अपने मन में ही सवाल जवाब से अपना मन शांत कर लिया। और दरवाज़े से बाहर ठण्ड में खड़े पेड़ पौधों को निहारने लगे। दादा जी बाहर देख ही रहे थे की अचानक उन्हें किसी के आने की आवाज़ सुनाई दी, उन्होंने सोचा शायद अजय(छोटे भईया) होगा। फिर उन्होंने देखा की बड़े भईया आये कमरे का दरवाज़ा खोलने लगे। ये देख कर तो दादा जी के होश उड़ गए, वो कुछ नहीं बोले बस देख रहे थे। बड़े भईया न दरवाज़े की कुंडी खोली और दादा जी को आवाज़ लगायी "दादा, सो गए क्या?" "नहीं, अभी नहीं। क्या हुआ?" दादा जी ने जवाब देकर सवाल किया। "कुछ चाहिए तो नहीं?" भईया ने पूछा। "नहीं, कुछ नहीं चाहिए।" दादा जी ने जवाब दिया। वो अभी भी अपनी आँखों की सच्चाई और वहम के बीच अंतर ढूंढ़ रहे थे। "ये दरवाज़ा बंद कर लो वरना ठण्ड अन्दर आयेगी। " भईया इतना कह कर दरवाज़ा बंद करके के लिए आगे बढे। "विजय, ज़रा यहाँ आओ।" दादा जी ने भईया को अपने पास बुलाया। 


भईया जाकर दादा जी के पास पलंग पर बैठ गए। दादा जी ने अभी घटी हुयी वो घटना भईया को बताई और उन्हें वहां लेटने ने से मना करने लगे। भईया को अचम्भा तो हुआ। मगर भईया ने सोचा शायद दादा जी को वहम हुआ हो। उन्होंने दादा जी को समझाया की दरवाज़े की कुण्डी तो उन्होंने अभी खोली है फिर कोई पहले से अन्दर कैसे जा सकता है। फिर एक दो तर्क पश्चात भईया ने दादा जी को रजाई ओढ़ा दी और दुसरे कमरे में चले गए सोने के लिए। दादा जी की आँखों से नींद कोसो दूर थी, उनकी समझ में नहीं आ रहा था की कल जो बंद आँखों से देखा वो वहम था या जो आज खुली आँखों से देखा वो। वहम क्या है और सच्चाई क्या? बस इन घटनाओ के बारे में सोच सोच कर वो रात गुज़ारने लगे। रात के करीब डेढ़ बज रहे थे, दादा जी को नींद ने खुद से दूर रखा हुआ था। वो बस चुप चाप कमरे में रजाई ओढ़ कर खुले दरवाज़े से बाहर झाँक रहे थे। कमरे में अँधेरा था, बाहर एक बल्ब जल रहा था जिसकी रौशनी में वो बाहर देख रहे थे। वो किसी ध्यान में खोये हुए थे की उनका ध्यान किसी आवाज़ ने तोडा जेसे की किसी के चप्पल पहन कर चलने की आवाज़। 


उन्होंने ध्यान से आवाज़ को सुना तो वो आवाज़ भईया के कमरे से आ रही थी, दादा जी ने सोचा भईया को शायद प्यास वगेरह लगी होगी। आवाज़ के शांत होते ही उनका ध्यान फिर भईया पर से हट कर अपनी ही विचारधारा में खो गया। २ बजने वाले थे, उन्हें हलकी हलकी सी नींद आने लगी। वो एक झपकी ले चुके थे की उनकी आंख अचानक खुली और उन्होंने साफ़ साफ़ देखा की एक औरत जिसने गरारा कुरता सा पहना हुआ था और जिसका चेहरा और हाथ वगेरह एक दम काले से थे, वो दादा जी के कमरे से ही निकली और कमरे के बगल से घर के अन्दर जाने वाली गली में चली गयी। दादा जी ने उसे दरवाज़े से निकलते और फिर कमरे की बंद शीशे की खिड़की से देखा की वो अन्दर घर में जा रही थी। दादा जी तुरंत उठ गए, उन्होंने सोचा इतनी रात को घर की तो कोई औरत इस कमरे में आयेगी नहीं तो फिर ये कौन है? दादा जी ने कमरे की बत्ती जलाई और फिर जिस तरफ से वो घर के अन्दर की तरफ गयी थी उसके पीछे चल दिए। घर के अन्दर तक देख आये दादा जी मगर उन्हें वो काली औरत कहीं नज़र नहीं आई। दादा जी एक दम परेशान हो गये की ये कौन थी? और अन्दर आई तो गयी कहाँ? दादा जी ने सोचा की सुबह घर में सबसे पूछा जायेगा और अगर ये किसी घर के सदस्य की हरकत हुयी तो अच्छे से खबर ली जाएगी। फिर दादा जी वापस आकर उसी कमरे में बत्ती बंद करके लेट गये। 


फिर सोचने लगी की इसी वेश-भूषा घर में तो कोई नहीं रखता और न ही घर में कोई इतना काला है। दादा जी का मन इस बात को मानने को तैयार ही नहीं हो रहा था की ये कोई भूत प्रेत हो सकता है, वो मन में ही खुद को तर्क देते और भूतप्रेत के ऐसे साक्षात् दिखने को झुठला देते। वो इसे ही ख्यालो में खुद से सवाल जवाब करते हुए लेटे हुए थे के उन्होंने खिड़की से देखा की वो औरत गली में वापस आ रही है फिर चलते हुए उसी कमरे के दरवाज़े पर आई एक पल को रुकी और फिर कमरे के अन्दर आ गयी। "कौन है?" दादा जी ने डांटते हुए पूछा और फिर दादा जी ने बिना देर किये सिराहने लगे स्विच से बड़ी लाइट जला दी और फिर जो देखा उसकी वजह से हड़बड़ा गए। पूरे कमरे में कहीं भी कोई नहीं था। दादा जी तुरंत बिस्तर से उठ गए, वो पूरी तसल्ली करना चाहते थे। उन्होंने कमरे में मौजूद सोफे के नीचे, पलंग के नीचे और अलमारी में सब जगह देख डाला मगर उन्हें न तो वो औरत दिखाई दी और न ही उससे सम्बंधित कोई सुराग। पूरी तरह से देखने के बाद, दादा जी चिंता में डूबे हुए वहीँ अपने बिस्तर पर बैठ गए। और सोचने लगे की ये क्या हो रहा है? किस मुहूर्त में ये भूत बंगला खरीद लिया। अब क्या किया जाये? कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो बिस्तर में रजाई ओढ़ कर पलंग के सिराहने से पीठ टिका कर बैठे थे। 


उस वक़्त समय यही कोई पौने तीन बज रहे होंगे। तभी बगल वाले कमरे का दरवाज़ा खुला। दादा जी ने इस बार कुछ भी देखने से पहले ही भईया को आवाज़ दे डाली। भईया ने जवाब दिया तो दादा जी को थोड़ी तसल्ली हुयी। भईया दादा जी के कमरे आ गए और दादा जी के पास बैठ गए और उनके जागने की वजह पूछी। मगर दादा जी बात को टाल गए और भईया से उल्टा इतनी रात को जागने का कारण पूछा। भईया ने बताया की जरुर उस कमरे में कोई बात है। जैसा सपना दादा जी को आया था बिलकुल वैसा ही सपना उन्हें भी आया वो भी तीन बार। वैसी ही वेशभूषा वाला बलिष्ठ और लम्बा सा आदमी हाथ में फरसा लेकर आया और दो बार तो उन्होंने देखा की उसने सीधा भईया की गर्दन पर वार किया। जिससे भईया की नींद टूट जाती। लेकिन वो फिर भी सोये वो देखना चाहते थे की क्या सकता है वो। जब वो तीसरी बार सोये तो उन्होंने देखा की वो आदमी उनकी पलंग के बगल में खड़ा है और कह रहा है की "जहाँ पर तुम इस वक़्त लेटे हो ये मेरी जगह है। मुझे मजबूर मत करो की मैं तुम्हे कोई नुक्सान पहुँचाऊ। बस इतनी जगह पर कभी कोई न लेटे, इस जगह को छोड़ दो। यहाँ जो भी रखोगे बढेगा मगर कभी किसी यहाँ लेटाना मत। ये मेरी आखिरी चेतवानी है वरना जो यहाँ लेटा वो उठेगा नहीं।" 


इतना कह कर उसने सपने में ही भईया को इतनी जोर से लात मारा की भईया सच में पलंग से नीचे आ गिरे। और फिर उसके बाद उठकर बाहर दादा जी के पास आ गये। दादा जी ने भईया की पूरी बात सुनी और फिर भईया से कहा "उसकी जो मर्जी थी उसने बता दिया। जरुर वहां कुछ न कुछ तो है, अब क्या किया जाये? ये कमरा बंद कर दिया जाए या फिर कोई रास्ता है?" "दादा जी, अगर उसे पूरे कमरे की जगह चाहिए होती तो वो जिस दिन हम यहाँ आये थे उसी वक़्त बता देता या फिर अब तक कोई एस नुक्सान कर देता की हम चले गए होते।" भईया ने जवाब दिया। "मतलब, जहाँ अब पलंग है वो नहीं चाहता की वहां कोई लेटे। एक काम करो कल मिलकर वो पलंग वापस उसी जगह लगा दो जहाँ थी और उसकी जगह पर घर के राशन का भण्डारण करते हैं। उसके मुताबिक जो रखा जायेगा वो बढेगा, तो ये हमारे लिए अच्छा ही होगा। और इस कमरे में कभी मेरे सिवा कोई नहीं लेटेगा। 


अगर हम किसी तांत्रिक वगेरह को बुलाते हैं तो शायद वो नाराज़ हो जाये, जो की नुकसान दायक हो सकता है। इसलिए फ़िलहाल यही करते हैं। ठीक है?" दादा जी ने भईया से कहा। भईया ने हाँ में हाँ मिलायी। और फिर दादा जे ने ये बात घर में किसी को भी बताने से मना कर दी। फिर दादा जी ने कहा की "बेटा, शायद तांत्रिक को बुलाना जरुरी है। क्योकि मैंने इस कमरे में किसी और को देखा।" ये सुन भईया के होश उड़ गए। ये क्या होने लगा था घर में? एक बात सुलझी भी नहीं थी ठीक से के दूसरी मुसीबत आन पड़ी थी। भईया ने पूछा की क्या देखा था? दादा जी ने एक दम से पूरा घटना क्रम भईया को सुना दिया। भईया को एक और झटका लगा। फिर भईया ने धीरे से दादा जी की रजाई में पैर डाल कर बैठते हुए दादा जी का हाथ पकड़ कर कहा "दादा जी, मुझे लगा शायद धोखा होगा मगर आपसे पहले भी उस औरत को किसी ने देखा है अपने घर में।" अब झटका लगने की बारी दादा जी की थी, वो एकदम हक्के बक्के होकर भईया का मुह देखने लगे और फिर पूछा "किसने देखा है उसे? और फिर मुझे बताया क्यों नहीं?"  


अब आप अपनी कहानी मुझे watsapp पर भी भेज सकते है +918856093673 । हम इसे यहाँ आपके नाम के साथ पोस्ट करेंगे । लिखने की कोशिश किजिये ।  to be continued...  

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